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बिहार विधानसभा में आरक्षण बहस तेज, विपक्ष 85% आरक्षण की मांग पर अड़ा

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पटना: बिहार विधानसभा में सोमवार को आरक्षण को लेकर सियासी हंगामा देखने को मिला। विपक्षी दलों ने राज्य सरकार पर 85% आरक्षण लागू करने का दबाव बनाया। आरजेडी के विधायक भाई वीरेंद्र ने सरकार से कहा कि केंद्र को प्रस्ताव भेजकर तुरंत 85% आरक्षण लागू किया जाना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि अगर सरकार ऐसा कदम उठाती है तो पूरा विपक्ष इसका समर्थन करेगा।
वास्तव में, बिहार में वर्तमान में 50% आरक्षण लागू है, जबकि 2024 में जातीय जनगणना के बाद राज्य सरकार ने इसे 65% तक बढ़ाने का फैसला किया था। इस फैसले पर पटना हाईकोर्ट ने रोक लगा दी थी।
सरकार ने क्यों बढ़ाया आरक्षण?
नवंबर 2023 में बिहार सरकार ने गजट नोटिफिकेशन जारी कर आरक्षण को 50% से बढ़ाकर 65% करने की घोषणा की थी। यह निर्णय जातीय सर्वेक्षण की रिपोर्ट पर आधारित था, जिसमें पिछड़े वर्गों (BC, EBC), अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) की हिस्सेदारी बढ़ाने की सिफारिश की गई थी। इसके बाद बिहार विधानसभा ने बिहार आरक्षण संशोधन बिल पास किया।
हालांकि, इस निर्णय के खिलाफ जनहित याचिका दायर की गई। हाईकोर्ट ने कहा कि 65% आरक्षण सुप्रीम कोर्ट के 1992 के इंदिरा साहनी बनाम भारत संघ फैसले के तहत निर्धारित 50% सीमा के खिलाफ है। कोर्ट ने यह भी कहा कि राज्य सरकार ने सरकारी नौकरियों में पर्याप्त प्रतिनिधित्व के ठोस आंकड़ों के आधार पर निर्णय नहीं लिया, बल्कि सिर्फ आबादी के अनुपात को आधार बनाया। 10% आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) आरक्षण जोड़ने के बाद कुल आरक्षण 75% हो जाता है, जो संविधान के अनुसार सही नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा था?
1992 में सुप्रीम कोर्ट ने पिछड़े वर्गों और समान अवसर के अधिकार के बीच संतुलन बनाए रखने के लिए 50% की सीमा तय की थी। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि
अनुच्छेद 14 के तहत सबको बराबरी का हक है। आरक्षण अपवाद के रूप में होना चाहिए, नियम के रूप में नहीं।
कम से कम 50% सीटें ओपन कैटेगरी में रहनी चाहिए, ताकि सभी वर्ग योग्यता के आधार पर मुकाबला कर सकें।
50% की सीमा पहले के फैसलों, जैसे एम.आर. बालाजी बनाम मैसूर राज्य (1963), के आधार पर तय हुई। इसे पार करने के लिए असाधारण परिस्थितियां और ठोस प्रमाण होने चाहिए।
सवाल अब भी बरकरार
बिहार में सरकारी नौकरी और शिक्षा में आरक्षण की सीमा बढ़ाना संविधान और सुप्रीम कोर्ट के फैसलों की नजर में चुनौतीपूर्ण बना हुआ है। विपक्ष के दबाव और सामाजिक मांगों के बीच सरकार की राह कठिन है। अब देखने वाली बात यह है कि नीतीश सरकार इस मुद्दे पर कौन सा अगला कदम उठाती है और क्या यह संवैधानिक सीमा से बाहर जाने की हिम्मत कर पाएगी।

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